Tuesday, January 3, 2012

बचपन

छू लेने दो इन नन्हे हाथों को आसमान         
वरना चार किताबें पढके हम जैसे हो जाएँगे
जी लेने दो खुशियों में चार पल इन्हें
वरना दुनियां में फस कर गम जैसे हो जाएँगे
नाच लेने दो इन्हें आज अपने कदमों पर
वरना हाथों में नाचने वाली रम जैसे हो जाएँगे
छोड़ दो आजाद इन्हें आज जीने को
वरना जीवन के झमेलों में तंग जैसे हो जाएँगे
चलो फिर से खेलें इन नन्हीं कलियों के साथ
वरना फिर ये पल एक भ्रम से हो जाएँगे
छू लेने दो इन नन्हे हाथों को आसमान
वरना चार किताबें पढके हम जैसे हो जाएँगे

26 comments:

  1. उत्कृष्ट अभिव्यक्ति..आभार

    ReplyDelete
  2. बचपन बचाओ ...बहुत सुंदर !

    ReplyDelete
  3. नववर्ष की हार्दिक मंगलकामनाओं के आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल बुधवार के चर्चा मंच पर भी होगी!

    ReplyDelete
  4. सुंदर अभिव्यक्ति।

    ReplyDelete
  5. सटीक,तार्किक एवं जाग्रत करने वाली रचना

    ReplyDelete
  6. छू लेने दो इन नन्हे हाथों को आसमान
    वरना चार किताबें पढके हम जैसे हो जाएँगे
    सुन्दर..
    kalamdaan.blogspot.com

    ReplyDelete
  7. प्रस्तुति अच्छी लगी । मेरे नए पोस्ट " जाके परदेशवा में भुलाई गईल राजा जी" पर आपके प्रतिक्रियाओं की आतुरता से प्रतीक्षा रहेगी । नव-वर्ष की मंगलमय एवं अशेष शुभकामनाओं के साथ ।

    ReplyDelete
  8. सुन्दर अभिव्यक्ति नौनिहालों को समर्पित रीझती हुई बचपन पर .

    ReplyDelete
  9. पढ़ते हैं, पर मानवता से,
    कितना दूर बिछड़ते हैं।

    ReplyDelete
  10. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति,सार्थक रचना...

    WELCOME to new post--जिन्दगीं--

    ReplyDelete
  11. सुंदर रचना.
    जाग्रत करने वाली रचना.

    ReplyDelete
  12. छू लेने दो इन नन्हे हाथों को आसमान
    वरना चार किताबें पढके हम जैसे हो जाएँगे

    ye masoomiyat....ye bachpana bana rahe....
    inshallah...!

    ReplyDelete
  13. आपकी कविता अच्छी लगी । मेरे नए पोस्ट " तुम्हे प्यार करते-करते कहीं मेरी उम्र न बीत जाए " पर आपके प्रतिक्रियाओं की आतुरता से प्रतीक्षा रहेगी । धन्यवाद ।

    ReplyDelete
  14. जीवन का अनमोल समय- बचपन !
    बहुत अच्छी बातें वर्णित हैं आपकी रचना में।

    ReplyDelete
  15. बहुत सच कहा है...बचपन की मासूमियत बरकरार रहने दें और उसे पूरी तरह जीने दें.

    ReplyDelete
  16. Behad sundar bhaav aur abhivyakti... Ati sundar ..aaj ka bachpan chhin raha haikitabon k haath aapne usey rokne kee koshish kee hai..bahut sundar..

    ReplyDelete
  17. सुंदर कविता।

    माँ के आंचल में छुप जाना
    घुटनो के बल चलते-चलते।
    बचपन था एक खेल सुहाना
    कहीं खो गया चलते-चलते।।

    ReplyDelete
  18. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति.......

    ReplyDelete
  19. सुन्दर अभिव्यक्ति
    आशा

    ReplyDelete
  20. मेरे नए पोस्ट "मुझे लेखनी ने थामा इसलिए मैं लेखनी को थाम सकी" (मन्नू भंडारी) पर आपके प्रतिक्रियाओं की आतुरता से प्रतीक्षा रहेगी । धन्यवाद ।

    ReplyDelete
  21. सुंदर प्रस्तुति।

    ReplyDelete
  22. बढ़िया प्रस्तुति...

    ReplyDelete
  23. आपकी प्रस्तुति बहुत अच्छी लगी.
    बचपन को अभिव्यक्त करती मासूम सी.

    आभार.

    ReplyDelete