Saturday, April 30, 2011

भाई बहन

श्री गोपाल सिंह "नेपाली" जी की एक रचना,  भाई बहन|

तू चिंगारी बनकर उड़ री,  जाग- जाग में ज्वाला बनूँ :
तू   बन  जा  हृहराती  गंगा,  मैं   झेलम  बेहाल   बनूँ |

आज  बसंती  चोला  तेरा,  मैं  भी सज लूं,  लाल  बनूँ :
तू  भगिनी  बन क्रांति कराली, मैं भाई  विकराल बनूँ |

यहाँ   न   कोई   राधा   रानी,   ब्रिन्दावन ,  बंशीवाला:
तू  आँगन  की ज्योति बहन री, मैं  घर का पहरेवाला |

बहन  प्रेम  का पुतला हूँ  मै, तू  ममता  की गोद बनी:
मेरा  जीवन  क्रीडा-कौतिक, तू  प्रत्यक्ष  प्रमोद  बनी|

मैं   भाई   फूलों   में  भूला,  मेरी  बहन  विनोद  बनी: 
भाई की गति,मति भगिनी की दोनों मंगल-मोद बनी|

यह  अपराध   कलंक  सुशीले,  सारे  फूल जला  देना:
जननी की जंजीर बज रही, चल तबियत बहला देना| 

भाई  एक  लहर  बन आया, बहन  नदी  की  धारा  है:
संगम   है,   गंगा   उमड़ी   है,  डूबा  कुल  किनारा  है |

यह  उन्माद,  बहन  को  अपना  भाई  एक  सहारा है :
कह अलमस्ती ,एक  बहन ही  भाई  का  ध्रुबतारा  है |

पागल  घडी,  बहन-भाई  है,  वह  आजाद  तराना  है :
मुसीबतों  से  बलिदानों  से  पत्थर को  समझाना  है|

Friday, April 22, 2011

कौसानी


             कौसानी उत्तराखंड का एक पर्यटक स्थल है| यह अल्मोड़े से ५३ की: मी: की  दूरी पर अल्मोड़ा बागेश्वर मोटर मार्ग पर स्थित है| कौसानी समुन्द्र ताल से १८९० मी:  की ऊंचाई पर है| यहाँ से ३५० की:मी: चौड़ी हिमालय पर्वत श्रंखला दिखाई देती है| उत्तराखंड में बहुत कम जगहों से ऐसे नज़ारे देखने को मिलते हैं| यहाँ से नंदा देवी, नंदाकोट, पंच्सुली, कमेट आदि कई जगप्रसिद्ध चोटियाँ  एक साथ दिखाई देती हैं| कौसानी एक ऊँची पहाड़ी में स्थित है, इस के एक तरफ सोमेश्वर की घाटी है और दूसरी तरफ बैजनाथ (कत्यूर) की घाटी है| जब १९२९ में महात्मा गांधी जी बागेश्वर में जनसमूह को संबोधन करने के लिए आये तो उन्होंने कौसानी के अनासक्ति आश्रम में कुछ समय बिताया| जहाँ इस समय कस्तूरबा गांधीजी का संग्रहालय है| उस समय गाँधी जी ने कौसानी को स्विट्जरलेंड ऑफ़ इंडिया का नाम दिया था| यहाँ से सूर्योदय और सूर्यास्त का का नजारा देखते ही बनता है ऐसे लगता है जैसे सारे हिमालय को सोने की चादर से ढक दिया हो|
              
               हिंदी के मशहूर कवि सुमित्रा नंदन पन्त जी की यह जन्म स्थली है| जहा पर उन्हों ने अपना बचपन बिताया|  पन्त जी जिस घर में पैदा हुए थे वहां अब उनका संग्रहालय बना दिया गया है| पन्त जी जिस स्कूल में पड़ते थे वह आज भी उसी तरह चल रहा है|
                 
                कौसानी में एक लक्ष्मी आश्रम (सरला देवी आश्रम) भी है| जो बस स्टेसन से १ की: मी: की दूरी पर स्थित है| यह आश्रम एक अंग्रेज औरत ने बनाया था जो लन्दन की मूल निवासी थी| जिस का नाम कैथरीन मेरी हेल्व्मन था| वह जब १९४८ में हिंदुस्तान घूमने आई तो गाँधी जी से प्रभावित होकर हिंदुस्तान में ही रह गयी| कौसानी को उन्हों ने अपने करम स्थली के रूप में चुना| यहाँ उन्हों ने लक्ष्मी आश्रम के नाम से एक बोर्डिंग स्कूल चलाया जिस में लड़कियों को सिलाई कढ़ाई बुनाई आदि सिखाया जाता है| श्री कृष्ण जन्मा अष्टमी को यहाँ बहुत भारी मेला लगता है|

                  कौसानी में एक उत्तराखंड टी इस्टेट भी है जो कौसानी से ६ की:मी: की दूरी पर बैजनाथ की तरफ को है| यहाँ की चाय काफी खुशबूदार होती है| यहाँ की चाय विदेशो को जाती है जिसकी विदेशों में काफी मांग है| आम तुलना में यहाँ की चाय की कीमत बहुत ज्यादा है|   

Tuesday, April 12, 2011

स्याल्दे बिखोती



            बैशाखी भारत के सभी राज्यों में अलग अलग नाम से मनाई जाती है| हमारे उत्तराखंड में बैशाखी "बिखोती" के नाम से जानी जाती है| उत्तराखंड में हर एक संक्रांति को कोई मेला या त्यौहार होता है| बैशाख के महीने की संक्रांति को बिश्वत  संकरान्ति के नाम से जाना जाता है| इस दिन कुमाऊ में स्याल्दे  बिखोती का मेला लगता है| वैसे तो बिखोती को संगमों पर नहाने का भी रिवाज है| लोग बागेश्वर, जागेश्वर आदि संगमों पर नहाने जाते हैं| इस दिन इन संगमों पर भी अच्छा खासा मेला लग जाता है| इस दिन तिलों से नहाने का भी रिवाज है| तिल पवित्र होते हैं और हवन यज्ञ में प्रयोग होते हैं| कहते हैं कि साल भर में जो विष हमारे शरीर में जमा हुआ होता है इस दिन तिलों से नहाने पर वह विष झड जाता है|
           कुमाऊ में यह मेला द्वाराहाट में लगता है जो रानीखेत से २८ कि: मी: कि दुरी पर है| द्वाराहाट में पांडवों के ज़माने के कई मंदिर है, जो सभी पास पास हैं| इन मंदिर समूहों के बीच में एक पोखर (ताल ) भी है जहाँ यह मेला लगता है| इस मेले में भोट,नेपाल आदि जगहों से भी लोग आते हैं| यह मेला ब्यापारिक दृष्टि से भी काफी मशहूर है| लोगों को यहाँ पर अपनी जरुरत कि चीजों को खरीदने का मौका मिलता है|
            इस मेले में लोगों को अपनी कला का प्रदर्शन दिखने का भी अच्छा मौका मिलता है| नए कलाकार यहाँ आकर अपनी रचनाओं को गा गा कर सुनाते हैं,इस से लोगों का भी मनोरंजन हो जाता है| इस मेले में कई मशहूर कलाकार भी अपनी कला का प्रदर्शन कर के लोगों का मन मोह लेते हैं| इस सबंध में कुमाऊ के मशहूर गायक स्व: गोपाल बाबु गोश्वामी ने एक गीत गया है जिस के बोल इस तरह हैं|
            अलघतै  बिखोती मेरी दुर्गा हरे गे| सार कौतिका चनें मेरी कमरा पटे गे|
भाव:-इस बिखोती में मेरी दुर्गा खो गई है, सारे मेले में ढूढ़ते मेरी कमर थक गई है|           
           एक और गायक ने गाया है|
           हिट साईं कौतिक जानूं  द्वाराहटा | ओ भीना कसिका जानू द्वाराहटा |
भाव:-जीजा अपनी साली से मेले में चलने को कहता है पर साली अपनी मज़बूरी जताती है कैसे जाऊं मेले में|
         द्वाराहाट वैसे तो रानीखेत तहसील का एक छोटा सा क़स्बा है| यहाँ पर डिग्री कालेज है, पोलिटेक्निक है और इंजीनियरिग कालेज भी है| यहाँ से मात्र ६ कि: मी: की दूरी पर माता दूनागिरी जी का प्रसिद्द मंदिर है| जो दूनागिरी पर्वत पर बिराजमान है| कहते हैं कि इस द्रोणागिरी पर्वत पर अभी भी संजीवनी बूटी मिलती है परन्तु उसे ढूढने के लिए कोई सुशेन वेद्य चाहिए| 

                                                        
बैसाखी की हार्दिक शुभकामनाये|

फोटो साभार : google.com

Saturday, April 2, 2011

नवसंवत्सर २०६८ की हार्दिक शुभकामनाएँ|



              विक्रम संवत का आरम्भ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होता है, जो इस वर्ष ४ अप्रेल को है| भारत में कालगणना  इसी दिन से प्रारंभ हुई| ऋतु मास  तिथि एवं पक्ष आदि की गणना भी यही से शुरू होती है| विक्रमी संवत के मासों के नाम आकाशीय नक्षत्रों के उदय अस्त से सम्बन्ध रखते हैं| वे सूर्य चन्द्र की गति पर आश्रित हैं| विक्रमी संवत पूर्णत: वैज्ञानिक सत्य पर स्थित हैं| विक्रम संवत सूर्य सिद्धांत पर चलता है|
              अर्थशास्त्र में काल गणना की इकाई "पल" है, एक पलक झपकने में जितना समय लगता है उसे पल कहते हैं|
              नवसंवत्सर बसंत ऋतु में आता है|  बसंत में सभी प्राणियों को मधुरस प्रकृति से प्राप्त होता है| काल गणना का सम्पूर्ण उपक्रम निसर्ग अथवा प्रकृति से तादात्म्य रख कर किया जाता है| चित्रा नक्षत्र से आरम्भ होने पर इस मास का नाम चैत्र  रखा गया| विशाखा नक्षत्र से बैशाख,जेष्ठा नक्षत्र से जेठ ,पुर्वाषाढा से आषाढ़ , श्रवन नक्षत्र से श्रवन , पूर्वभादरा से भादव, अश्वनी नक्षत्र से असोज (आश्विन), कृतिका से कार्तिक, मृगशिरा से मार्गशीर्ष; पुष्य से पौष, मघा  से माघ और पूर्व फाल्गुनी नक्षत्र से फाल्गुन नामों का नामकरण हुआ|
            सूर्य का उदय होना और अस्त होना दिन रात का पैमाना बन गया| चन्द्रमा  का घटने बढ़ने का आशय चन्द्रमा  का पृथवी से दूरी घटने बढ़ने से है| इसके आधार पर ही शुक्ल पक्ष, कृष्ण पक्ष और महीने का अस्तित्व आया| दिन रात में २४ होरा होते हैं| प्रत्येक होरा का स्वामी सूर्य,शुक्र,बुध ,चन्द्र शनि, गुरु और मंगल को माना गया है| सूर्योदय के समय जिस गृह की होरा होती है उसदिन वही वार होता है| चन्द्र की होरा में चन्द्रवार (सोमवार) मंगल की होरा में मंगलवार, बुध की होरा में बुधवार, गुरु की होरा में गुरुवार, शुक्र की होरा में शुक्रवार, शनि की  होरा में शनिवार और सूर्य की होरा में रविवार होता है| इस प्रकार सातों दिवसों की गणना की गई है|
            हमारे उत्तराखंड में नवसंवत्सर के मौके पर लोग अपने घरों की लिपाई पोताई करके घर की साफ सफाई करते हैं| ऐपन(अलप्ना) निकालते है| हमारे यहाँ नवसंवत्सर का नाम पुरोहित से ही सुनने का रिवाज है| पुरोहित के मुंह से ही नवसंवत्सर का नाम सुनना शगुन माना जाता है|
            सभी ब्लॉग प्रेमियों को नवसंवत्सर २०६८  की हार्दिक शुभकामनाएँ|

Tuesday, March 22, 2011

भिटौली

             भिटौली का मतलब है मिलना या भेंट करना| पुराने ज़माने में उत्तराँचल के दूर दराज के गांवों में जाने का कोई साधन नहीं था| लोग दूर दूर तक पैदल ही जाया करते थे| एक दिन में १५-२० मील  का सफ़र तय कर लेते थे| रास्ते भी जंगलों के बीच में से हो कर जाते थे| जंगलों में अनेक प्रकार के जानवर भी हुआ करते थे| उस ज़माने में बच्चों की शादी छोटी उम्र में ही कर देते थे| नई ब्याही लड़की अकेले अपने मायके या ससुराल नहीं जा सकती थी| कोई न कोई पहुँचाने वाला चाहिए था| इस तरह कभी तो ससुराल वाले लड़की को मायके भेजते नहीं थे और कभी कोईपहुंचाने वाला नहीं मिलता था| हमारे पहाड़ में चैत के महीने को काला महिना मानते हैं और नई ब्याही लड़की पहले चैत के महीने में ससुराल में नहीं रहती है| उसको मायके में आना होता है| इस तरह ससुराल जाते समय भाई अपनी बहिन को या पिता अपनी बेटी को कुछ न कुछ उपहार दे कर ससुराल को बिदा करते थे| पहले चैत के बाद लड़की को जब कोई पहुँचाने वाला मिलता तो ही वह मायके आ सकती थी| कई बार तो लड़की सालों तक भी अपने मायके नहीं जा पाती थी| उसको अपने मायके की नराई तो बहुत लगती थी पर ससुराल में रहने को बाध्य  थी| पुराने बुजुर्गों ने इस बिडम्बना को दूर करने के लिए एक प्रथा चलाई| जिस का नाम भिटौली रक्खा गया| इस प्रथा में भाई हर चैत के महीने में बहिन के ससुराल जाकर उसको कोई उपहार भेंट  कर के आता है| जिस में गहने कपडे और एक गुड की भेली होती है| गुड की भेली को तोड़  कर गांव में बाँट दिया जाता है, जिस से पता चलता है की फलाने की बहु की भिटौली आई है| एक बार एक भाई भिटौली लेकर अपनी बहिन के पास गया| बहिन उस समय सोई हुई थी तो भाई ने उसे जगाने के बजाय उसके जागने का इंतजार करना ठीक समझा,और वह वहीँ बैठा उसके जागने का इंतजार करने लगा | भाई के जाने का समय हो गया पर बहिन नहीं जागी| भाई उसकी भिटौली उसके सिरहाने रख कर एक चरेऊ ( गले में डालने वाली माला ) उसके गले में लटका गया और खुद गांव को वापस आ गया| बहिन की जब नींद खुली तो देखा कि उसके गले में चरेऊ लटक रहा है, भिटौली सिरहाने रक्खी है पर भाई का कोई पता नहीं है| वह भाई को आवाज देती बाहर आई | भाई को कहीं भी न देख कर उसके मन में एक टीस उठी और बोली "भै भूखो मैं सीती" मतलब भाई भूखा चला गया और में सोई रह गई| बहिन इस पीड़ा को सहन नहीं कर सकी और दुनिया से चली  गई| अगले जन्म में वह घुघुति (फाख्ता) बन कर आई जिस के गले में एक काले रंग का निशान होता है और बोलने लगी " भै भूखो मैं सीती, भै भूखो मै सीती " जो आज भी पेड़ों पर बैठी बोलती सुनाई देती है| और आज भी  इस परम्परा को निभाते हुए एक भाई अपनी बहिन को चैत के महीने में भिटौली देने जरुर जाता है| परन्तु आजकल अधिकतर भाई अपनी नौकरी के सिलसिले में दूर रहते हैं और अब व्यस्तता अधिक हो गयी है सो बहिनों को मनीओडर या कोरिअर भेजकर भाई अपने फ़र्ज़ की इतिश्री कर देते हैं |  हमारी उन भाइयों से अर्ज है कि वे साल में एक बार चैत के महीने में बहिन के घर खुद जाकर उसे भिटौली दें , जिस से इस परम्परा को जीवित रक्खा जा सके| धन्यवाद|                                         के. आर. जोशी.( पाटली)
  

Wednesday, March 16, 2011

फूलधेयी

                   फूलधेयी का मतलब धेयी( देहरी ) पर फ़ूल डालकर उस घर में रहने वालों के लिए शुभकामना करना है| जिस तरह अंग्रेज लोग फूलों का गुच्छा (बुके) देकर अभिवादन करते हैं ठीक उसी तरह उत्तराँचल के कुमाऊ आँचल में चैत महीने के शुक्ल पक्ष के पड़ेले को( जिसे संवत्सर पड़ेला भी कहते हैं) इस फूलों के  त्यौहार को मानते है| इस दिन से नया साल सुरु हो जाता है| शायद नए साल की ख़ुशी में ही इस त्यावाहर का प्रचालन हुवा हो|  
इस त्यौहार  में  छोटे  बच्चों  की  बहुत  दिलचस्पी  होती  है| बच्चे एकदिन पहले से ही तयारी में लग जाते हैं| पहले दिन शाम को ही कई रंगों के फ़ूल तोड़ कर ले आते हैं| जिस में बुराश, प्योली, मिझाऊ, गुलाब आदि के फ़ूल होते हैं| पड़ेले के दिन सुबह उठ कर धेयी (देहरी) को लीप कर साफ किया जाता है | छोटे बच्चे नहा धो कर तयार होते हैं| फिर एक थाली या टोकरी जो बांस की बनी होती है जिसे कुमाउनी में टुपर कहते हैं में कुछ चावल और फ़ूल रख कर बच्चे गांव में हर घर की धेयी (देहरी) में जाकर फ़ूल डालते हैं और मुंह से बोलते हैं|
फ़ूल धेयी, छम्मा धेयी, देणी द्वार, भर भाकर|
यौ  धेयी  सौ  बार,  बारम्बार  नमस्कार|
                    फिर उस परिवार वाले बच्चों को अपनी सामर्थ मुताबिक गुड, चावल मिठाई, पैसे आदि देते हैं| इस प्रकार जो चावल और गुड  इकठ्ठा होता है उस से एक पकवान बनाया जाता है जिसे सेई कहते हैं| यह पकवान चावल के हलवे की तरह होता है| जो खुद भी खाते हैं और पास पड़ोस में भी बाँटते हैं| इस तरह कुमाउनी बच्चे फ़ूल धेयी छम्मा धेयी का नारा लगा कर इस परम्परा को जिन्दा रक्खे हुए हैं|

Sunday, March 6, 2011

माँ की लोरियाँ

माँ की आवाज 
अंधेरों में सोते से 
अचानक जगाती है 
वह माँ जो मुझे 
लोरियां गाकर सुनती थी,
आज अकेले में गाकर दो पंक्तियाँ 
स्वयं को सहज पाती है 
इतनी दूर से भी उसका स्पर्श 
वो हाथ, वो बात, वो लोरियां 
सब कुछ याद आता है 
तो मेरा ह्रदय अचानक ही 
द्रवित हो जाता है 
आंसू छलकते हैं आँखों से
मन उदास और उदास हो जाता है
चाहता हूँ मैं भी कि संग रहूँ सब के 
पर सोचते- सोचते ही  सबेरा हो जाता है 
और पुन: नवीन दिवस के साथ 
नवीन कल्पनाएँ संजोने लगता हूँ
रात में फिर माँ की, लोरियों की             
यादों में खोने लगता हूँ|