लोकरंजन की इच्छा वाला मनुष्य शुद्धाचारी ही हो ऐसी बात नहीं है। उसको तो अपने बाहरी दिखावे पर अधिक ध्यान रखना पड़ता है, इसीसे वह सुन्दर स्वर में गाना, मधुर भाषा में ब्याख्यान देना, नाचना, को हँसाने-रुलानेके उद्देश्यसे विभिन्न प्रकार के स्वरों में बोलना, भाव बताना, मुखाकृति बनाना,ध्यानस्थ की भाँति बैठना आदि न मालूम कितनी बातें करता है। उसका ध्यान रहता है कि मेरे गायन,भाषण व्याख्यान,सत्संग से और मेरी ध्यानस्थ मुर्तिसे लोगों का मेरी ओर खिंचाव हुआ या नहीं। गान,नृत्य, भावप्रदर्शन आदि चीजें कला की दृष्टिसे बहुत उपादेय हैं और किसी सीमातक प्रचारकी दृष्टिसे भी इसकी उपयोगिता है,परंतु जहाँ और जितने अंश में इनका उपयोग केवल लोकरंजन के लिए होता है,वहां उतने अंश में इस लोकरंजन के पीछे,किसी भी हेतुसे हो,अपने व्यक्तित्व के प्रचारकी वासना छिपी रहती है। तुम यदि साधक पुरुष हो अथवा अपना पारमार्थिक कल्याण चाहते हो तो ऐसी वासना को मनद्वारा कहीं किसी कोने में भी मत रहने दो। भगवान की भक्ति और सदाचार का प्रचार भगवत्सेवा के लिए ही करो।
Friday, September 6, 2013
Sunday, July 14, 2013
फ़िराक़ गोरखपुरी जी की एक गजल
बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं
तुझे ऐ ज़िन्दगी हम दूर से ही पहचान लेते हैं
तबीयत अपनी घबराती है जब सुनसान रातों में
तो ऐसे में तेरी यादों की चादर तान लेते हैं
हम-आहंगी में भी इक चाशनी है इख्तिलाफों की
मेरी बातें ब-उन्वाने-दिगर वो मान लेते हैं
जिसे सूरत बताते हैं पता देती है सीरत का
इबारत देख कर जिस तरह मा नी जान लेते हैं
रफ़िके-जिन्दगी भी अब अनिसे-वक्ते-आखिर है
तेरा ऐ मौत हम ये दूसरा एहसान लेते हैं
फ़िराक अक्सर बदल कर भेस मिलता है कोई काफ़िर
कभी हम जान लेते हैं कभी हम पहचान लेते हैं
बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं
तुझे ऐ ज़िन्दगी हम दूर से ही पहचान लेते हैं
तबीयत अपनी घबराती है जब सुनसान रातों में
तो ऐसे में तेरी यादों की चादर तान लेते हैं
हम-आहंगी में भी इक चाशनी है इख्तिलाफों की
मेरी बातें ब-उन्वाने-दिगर वो मान लेते हैं
जिसे सूरत बताते हैं पता देती है सीरत का
इबारत देख कर जिस तरह मा नी जान लेते हैं
रफ़िके-जिन्दगी भी अब अनिसे-वक्ते-आखिर है
तेरा ऐ मौत हम ये दूसरा एहसान लेते हैं
फ़िराक अक्सर बदल कर भेस मिलता है कोई काफ़िर
कभी हम जान लेते हैं कभी हम पहचान लेते हैं
Tuesday, March 26, 2013
होली
बलमा घर आयो फागुन में -२
जबसे पिया परदेश गये , आम लगावे बागन में।
बलमा घर…
चैत मास में कांफल पाके, आम जी पाके सावन में।
बलमा घर…
गऊ को गोबर आंगन लिपायो, मंगल काज करावन में।
बलमा घर…
प्रिय बिन बसन रहे सब मैले, चोली चादर भिजावन में।
बलमा घर…
भोजन पान बानये मन से, लड्डू पेड़ा लावन में।
बलमा घर…'
सुन्दर तेल फुलेल लगायो, स्योनिश्रृंगार करावन में।
बलमा घर…
वस्त्र आभूषण साज सजाये, लागि रही पहिरावन में।
बलमा घर आयो फागुन में।
Saturday, January 5, 2013
इन्दर ( इनरु मुया )
बहुत समय पहले की बात है एक गांव में इन्दर नाम का लड़का रहता था| इन्दर का इस दुनियां में कोई नहीं था|बेचारा अनाथ था| लोग उसे इनरु मुया इनरु मुया कहते थे|(मुया का मतलब अनाथ से है) जब इन्दर कुछ बड़ा हुआ तो गांव के लोगों ने उसे अपने गाय बछिओं को चराने के लिए ग्वाला रख लिया|इन्दर रोज सुबह गायों को लेकर बन में चला जाता सारा दिन गायों को चराता और शाम को वापस ले आता| गांव वाले उसे बारी बारी से खाना और कपड़ा दे देते थे | इस तरह इन्दर का समय बीत रहा था| एक दिन किसी ने इन्दर को दो बेर देदिए| बेर स्वाद थे इन्दर ने बेर खा कर गुठलियाँ जंगल में जा कर मिटटी मे दबा दी कुछ समय बाद वहां पर बेर के पेड़ उग आये | इन्दर ने पौधों की साम संभाल की तो कुछ ही सालों में पौधे काफी बड़े हो गए और उन पर फल भी लगने लग गए| बेर काफी मीठे और स्वादिष्ट थे| इन्दर खुद भी खाता और लोगों को भी खाने को देता था| एक बार एक बुढ़िया वहां से जा रही थी| उस की नज़र बेरों पर गई, उसने इन्दर से बेर मांगे तो इन्दर ने बुढ़िया को बेर दे दिए| वह बुढ़िया एक नरभक्षी थी| जब उसने बेर खाए तो सोचा, ये बेर अगर इतने मीठे हैं तो इन बेरो को खाने वाला कितना मीठा नहीं होगा? उसने इन्दर को पकड़ने की चाल बनाई | बुढ़िया के कंधे पर एक बोरा टांका हुआ था | उसने सोचा कि इन्दर को किसी तरह बोरे में डाल लूँ तो शाम का खाना हो जाएगा| उसने इन्दर को अपने पास बुलाया और कहा इस बोरे में जादू है इस बोरे में बैठ कर जो मांगो मिल जाता है| इन्दर बेचारा सीधा साधा था उस ने सोचा देखूं क्या होता है| जैसे ही इन्दर बोरे में बैठा बुढ़िया ने बोरे को ऊपर से बांध दिया और पीठ पर बोरा लगा कर अपने घर की तरफ चल दी| रास्ते में बुढ़िया को प्यास लगी तो पानी पीने के लिए बुढ़िया ने बोरा जमीन पर रख्खा और पानी पीने चली गयी| वहां से कोई राही गुजर रहा था| इन्दर ने उस से बोरे का मुंह खोलने के लिए कहा | उसने बोरे का मुंह खोल दिया| इन्दर बोरे से बाहर आ गया | इन्दर ने फटा फट बोरे में पत्थर कांटे भ्रिड ,तितैया आदि जो भी हाथ लगा बोरे में भर दिया और ऊपर से वैसे ही बांध दिया | बुढ़िया आई बोरा उठाया घर को चल दी | रास्ते में उस की पीठ पर कांटे चुभने लगे तो उस ने सोचा कि इन्दर चिकोटी काट रहा है, उस ने कहा जितना मर्जी चिकोटी काट ले, घर जा कर तो मैं तुझे ही काट दूंगी| घर जा कर उस ने अपनी बेटी से कहा कि तू जरा इस का मांस तैयार कर मैं अभी आती हूँ, कहकर बुढ़िया कुछ लेने बाहर चली गयी| बुढ़िया की बेटी ने जब बोरे का मुंह खोला तो सारे भ्रिंद और तितैया बुढ़िया की बेटी पर चिपट गए और उस का बुरा हाल कर दिया | बुढ़िया ने आ कर देखा तो पछताने लगी कि मैंने रास्ते में क्यों उतारा|
कुछ दिनों बाद बुढ़िया अपना भेष बदल कर फिर से इन्दर के पास जंगल में गयी और इन्दर से बेर मांगे ,इन्दर ने कहा कि तू वही बुढ़िया है जिस ने कुछ दिन पहले मुझे बोरे में बंद कर लिया था | बुढ़िया ने कहा कि में तुझे वैसी बुढ़िया लग रही हूँ में तो किसी को यहाँ जानती भी नहीं हूँ| इन्दर ने देखा नजदीक में अब बेर भी नहीं हैं, तो उसने बुढ़िया से कहा कि बेर तो अब पहुँच से दूर रह गए हैं पंहुचा नहीं जाता है तो बुढ़िया ने तरकीब बताई कि सूखी टहनी पर पैर रख कर आगे बढ़ो तो बेर हाथ आ जाएँगे | इन्दर ने वैसा ही किया |जैसे ही इन्दर ने सूखी टहनी पर पैर रखा टहनी टूट गई और इन्दर नीचे गिर गया नीचे बुढ़िया पहले से ही तैयार थी उस ने बोरे का मुंह खोल दिया और इन्दर बोरे में जा गिरा| बुढ़िया ने फटा फट बोरे का मुंह बंद कर दिया| बुढ़िया ने बोरा फिर पीठ से लगाया और घर की तरफ चल दी , आज उसने कहीं भी बोरे को रास्ते में नहीं उतारा, सीधे घर जाकर ही उतारा| बुढ़िया ने अपनी बेटी से कहा कि आज तो मैं इन्दर को पकड़ कर सीधे घर ही लाई हूँ , इस का मांस तैयार कर मैं इस के तडके का इन्तजाम करती हूँ, कह कर बुढ़िया बाहर चली गयी| बुढ़िया के जाने के बाद जब बुढ़िया की बेटी ने बोरे का मुंह खोला तो देखा कि इन्दर के बाल बहुत पतले और लम्बे हैं तो उसने इन्दर से पूछा कि
उसके बाल इतने लम्बे कैसे हो गए, तो इन्दर ने कहा कि मैं अपने बालों को उखल में कूटता हूँ ,इस से मेरे बाल पतले और लम्बे बनते हैं| बुढ़िया की बेटी ने कहा एक बार मेरे बालों को भी कूट दो ताकि मेरे बाल लम्बे और पतले हो जाएँ, इन्दर ने कहा चलो उखल के पास चलो मैं तुम्हारे बालों को कूट देता हूँ, ताकि तुम्हारे बाल भी लम्बे हो जाएँ |बुढ़िया की बेटी मान गई और इन्दर को उखल में ले गई, इन्दर ने कहा अपने बालों को उखल में डालो मैं कूट देता हूँ| बुढ़िया की बेटी ने अपने बाल उखल में डाल दिए और इन्दर कूटने लग गया|उसने एक दो चोट बालों में मारी फिर उसके बाद बुढ़िया की बेटी के गर्दन पर दे मारी जिस से बुढ़िया की बेटी मर गई, इन्दर ने जल्दी से बुढ़िया की बेटी के कपडे उतार कर खुद पहन लिए और बुढ़िया की बेटी का मांस तैयार करके चूल्हे के पास बैठ गया, जब बुढ़िया आई तो इन्दर चुपचाप बाहर आ गया और छत के झरोखे से देखने लगा, बुढ़िया ने मांस को भून कर तैयार किया और बेटी को आवाज दी, बेटी होती तो आती वह तो इन्दर ने मारदी |इन्दर जो झरोखे से देख रहा था बोल उठा "देखी अपनी चालाकी अपनी बेटी खुद ही खाली" बुढ़िया ने कहा तुम्हारे पास क्या सबूत है तो इन्दर ने बुढ़िया की बेटी के कपडे झरोखे से नीचे गिरा दिए और उस के हाथ की अंगूठी भी गिरा दी| बुढ़िया बेटी की जुदाई सहन नहीं कर सकी| उसने अपनी जीभ अपने दातों तले दबा ली और काटली| इस तरह एक नरभक्षी बुढ़िया का अंत हो गया| इन्दर फिर जंगल में आ गया और अपनी रोज मर्रा की जिन्दगी जीने लग गया|
उसके बाल इतने लम्बे कैसे हो गए, तो इन्दर ने कहा कि मैं अपने बालों को उखल में कूटता हूँ ,इस से मेरे बाल पतले और लम्बे बनते हैं| बुढ़िया की बेटी ने कहा एक बार मेरे बालों को भी कूट दो ताकि मेरे बाल लम्बे और पतले हो जाएँ, इन्दर ने कहा चलो उखल के पास चलो मैं तुम्हारे बालों को कूट देता हूँ, ताकि तुम्हारे बाल भी लम्बे हो जाएँ |बुढ़िया की बेटी मान गई और इन्दर को उखल में ले गई, इन्दर ने कहा अपने बालों को उखल में डालो मैं कूट देता हूँ| बुढ़िया की बेटी ने अपने बाल उखल में डाल दिए और इन्दर कूटने लग गया|उसने एक दो चोट बालों में मारी फिर उसके बाद बुढ़िया की बेटी के गर्दन पर दे मारी जिस से बुढ़िया की बेटी मर गई, इन्दर ने जल्दी से बुढ़िया की बेटी के कपडे उतार कर खुद पहन लिए और बुढ़िया की बेटी का मांस तैयार करके चूल्हे के पास बैठ गया, जब बुढ़िया आई तो इन्दर चुपचाप बाहर आ गया और छत के झरोखे से देखने लगा, बुढ़िया ने मांस को भून कर तैयार किया और बेटी को आवाज दी, बेटी होती तो आती वह तो इन्दर ने मारदी |इन्दर जो झरोखे से देख रहा था बोल उठा "देखी अपनी चालाकी अपनी बेटी खुद ही खाली" बुढ़िया ने कहा तुम्हारे पास क्या सबूत है तो इन्दर ने बुढ़िया की बेटी के कपडे झरोखे से नीचे गिरा दिए और उस के हाथ की अंगूठी भी गिरा दी| बुढ़िया बेटी की जुदाई सहन नहीं कर सकी| उसने अपनी जीभ अपने दातों तले दबा ली और काटली| इस तरह एक नरभक्षी बुढ़िया का अंत हो गया| इन्दर फिर जंगल में आ गया और अपनी रोज मर्रा की जिन्दगी जीने लग गया|
Monday, December 31, 2012
नए साल 2013 की हार्दिक शुभकामनाएँ|
नया साल 2013 आप लोगों के लिए खुशियों भरा हो मंगलमय हो भगवान आप सब की मनोकामना पूर्ण करे और आप सब नए साल 2013 में दिन दुगुनी रात चौगुनी तरक्की करें| यह मेरी आप सब के लिए हार्दिक शुभकामना है| नए साल के आगमन पर आइए हम संकल्प करें कि हम इस देश के सच्चे नागरिक बनें| अंत में आप सब को नए साल 2013 की हार्दिक शुभकामनाएँ|
Tuesday, October 23, 2012
कलिन्दनन्दिनी
सदैव नन्दनन्दकेलिशालिकुञ्जमन्जुला तटोंत्थफ़ुल्लमल्लिकाकदम्बरेणुसुज्ज्वाला|
जलावगाहिनां नृणां भवाब्धिसिन्धुपारदा धुनोतु में मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा ||
जिसके तटवर्ती मन्जुल निकुन्ज सदा ही नन्दनन्दन श्रीकृष्ण की लीलाओं से सुशोभित होते हैं; किनारे पर बढ़ कर खिली हुई मल्लिका और कदम्ब के पुष्प-परागसे जिसका वर्ण उज्जवल हो रहा है, जो अपने जल में डुबकी लगाने वाले मनुष्य को भवसागर से पर कर देती है, वह कलिन्द-कन्या यमुना सदा ही हमारे मानसिक मलको दूर बहावे|
जलावगाहिनां नृणां भवाब्धिसिन्धुपारदा धुनोतु में मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा ||
जिसके तटवर्ती मन्जुल निकुन्ज सदा ही नन्दनन्दन श्रीकृष्ण की लीलाओं से सुशोभित होते हैं; किनारे पर बढ़ कर खिली हुई मल्लिका और कदम्ब के पुष्प-परागसे जिसका वर्ण उज्जवल हो रहा है, जो अपने जल में डुबकी लगाने वाले मनुष्य को भवसागर से पर कर देती है, वह कलिन्द-कन्या यमुना सदा ही हमारे मानसिक मलको दूर बहावे|
Wednesday, July 11, 2012
अन्धकासुर
बहुत समय पहले की बात है| हिरण्याक्ष का एक बेटा था, जिसका नाम अन्धक था|
अन्धक ने तपस्या के द्वारा ब्रह्मा जी की कृपा से न मारे जाने का वर
प्राप्त कर के त्रिलोकी का उपभोग करते हुए इन्द्रलोक को जीत लिया और वह
इन्द्र को पीड़ित करने लगा| देवतागण उस से डर कर मंदरपर्वत की गुफा में
प्रविष्ट हो गए| महादैत्य अन्धक भी देवताओं को पीड़ित करता हुआ गुफा वाले
मंदरपर्वत पर पहुँच गया| सभी देवताओं ने भगवान शिव से प्रार्थना की| यह सब
वृतांत सुन कर भगवान शिव अपने गणेश्वरों के साथ अन्धक के समक्ष पहुँच गए
तथा उन्हों ने उसके समस्त राक्षसों को भस्म कर के अन्धक को अपने त्रिशूल से
बींध डाला| यह देख कर ब्रह्मा, विष्णु आदि सभी देवगण हर्षध्वनि करने लगे|
त्रिशूल से बिंधे हुए उस अन्धक के मन में सात्विक भाव जागृत हो गए| वह
सोचने लगा- शिव की कृपा से मुझे यह गति प्राप्त हुई है| अपने पुण्य-गौरव के
कारण वह अन्धक उसी स्थिति में भगवान शिव की स्तुति करने लगा| उसकी स्तुति
से प्रसन्न हो कर भगवान शंकर दयापूर्वक उसकी ओर देखते हुए बोले- हे अन्धक!
वर मांगो, तुम क्या चाहते हो? अन्धक ने गदगद बाणी में महेश्वर से कहा- हे
भगवन! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मुझे यही वर प्रदान करें की आप में मेरी
सदा भक्ति हो|
अन्धक का वचन सुन कर शिव ने उस दैत्येन्द्र को अपनी दुर्लभ भक्ति प्रदान की और त्रिशूल से उतार कर उसे गणाधिपद प्रदान किया|
अन्धक का वचन सुन कर शिव ने उस दैत्येन्द्र को अपनी दुर्लभ भक्ति प्रदान की और त्रिशूल से उतार कर उसे गणाधिपद प्रदान किया|
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