Monday, September 5, 2011

मुक्त कौन होता है?


सुखदु:खे समे यस्य लाभालाभौ जयाजयौ| इच्छद्वेशौ भयोद्वेगौ सर्वथा मुक्त एव : ||
वालीपलित्संयोगे कार्श्यं वैवर्न्यमेव |कुब्जभावं जरया : पश्यति मुच्यते ||
पूंस्त्वोपघातं कालेन दर्शनोंपरमं तथा |बाधिर्य प्राणमन्दत्वं य:पश्यति स मुच्यते ||




जिसकी दृष्टि में सुख-दु:ख लाभ-हानि, जय पराजय सम है तथा जिसके इच्छा-द्वेष, भय और उद्वेग सर्वथा नष्ट हो गए हैं, वही मुक्त है| बुढ़ापा आनेपर इस शरीर में झुरियां पड़ जाती हैं, सिरके बाल सफ़ेद हो जाते हैं, देह दुबली-पटली एवं कांतिहीन हो जाती है तथा कमर झुकजाने के कारण मनुष्य कुबड़ा-सा हो जाता है| इन सब बातों की ओर जिसकी सदा ही दृष्टि रहती है, वह मुक्त हो जाता है| समय आने पर पुरुषत्व नष्ट हो जाता है, आखों से दिखाई नहीं देता है, कान बहरे हो जाते हैं और प्राणशक्ति अत्यंत क्षीण हो जाती है | इन सब बातों को जो सदा देखता और इनपर विचार करता रहता है, वह संसार-बंधन से मुक्त हो जाता है|

33 comments:

  1. अध्यापकदिन पर सभी, गुरुवर करें विचार।
    बन्द करें अपने यहाँ, ट्यूशन का व्यापार।।

    छात्र और शिक्षक अगर, सुधर जाएँगे आज।
    तो फिर से हो जाएगा, उन्नत देश-समाज।।
    --
    शिक्षक दिवस पर डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी को नमन करते हुए आपको शुभकामनाएँ प्रेषित करता हूँ!

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  2. सत्य वचन!! रेलगाड़ी की डिब्बों पर अक्सर अश्लील उक्तियाँ लिखी मिलाती हैं, किन्तु एक बार सूक्ति लिखी मिली जो आज के आपके विचार से मेल खाती है.. लिखा था- मृत्यु का सतत स्मरण ही अमरता का रहस्य है!!

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  3. तत्त्वज्ञान से व्यक्ति अमरत्व का अनुभव कर लेता है.

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  4. सही तत्व है।
    राग-द्वेष, तृष्णा मोह माया लोभ क्रोध से दूर रहना ही मुक्ति है। बंधन से मुक्ति!!

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  5. यह सम भाव आ जाये तो आनन्द ही आनन्द है।

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  6. बहुत ज्ञानवर्धक आलेख ।

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  7. लम्बे समय बाद ब्लॉग पर आपकी वापसी हुयी है, अच्छा लगा, आभार. आप जो भी लिखते हैं सार्थक लिखते हैं और प्रेरक भी. हमारे पौराणिक ग्रन्थ, वेद, उपनिषद आदि ही नहीं बल्कि अन्य ग्रन्थ जो भी हैं ज्ञान के भंडार है. मैंने ज्यादा तो नहीं पढ़े परन्तु कालिदास के रघुवंशम, अभिज्ञानशाकुंतलम, कुमारसम्भवम तथा वाणभट्ट की कादंबरी आदि ग्रन्थ विद्यार्थी जीवन में अवश्य पढ़े हैं. और बहुत गहरे मन पर छाप छोड़ गए हैं. .. संस्कृत के अनमोल खजाने को प्रस्तुत करने के लिए पुनः आभार.

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  8. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।
    --
    शिक्षक दिवस की शुभकामनाएँ!

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  9. ज्ञानवर्धक और अनुकरणीय विचार हैं ..

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  10. ज्ञानवर्धक आलेख .........आभार !

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  11. नश्वरता और परिवर्तन की शाश्वतता की और अच्छा संकेत किया है आपने .सम और साक्षी भाव बनाए रखना जीवन की कुंजी है .आभार !आपकी ब्लोगिया दस्तक हमारा संबल है .
    मंगलवार, ६ सितम्बर २०११
    विकिलीक्स आर एस एस और माया .....

    http://veerubhai1947.blogspot.com/2011/09/blog-post_06.html

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  12. बहुत सुन्दर सार्थक रचना
    आपकी सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार!!

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  13. लम्बे समय बाद ब्लॉग पर आपकी वापसी हुयी है, ज्ञानवर्धक आलेख

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  14. सार्थक लेखन के लिए बधाई |
    आशा

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  15. यही शाश्वत सत्य है । कबीर ने भी यही याद दिलाया है --नव द्वारे का पींजरा यामै पंछी पौन । रहत अचम्भा जानिये गए अचम्भा कौन ।

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  16. साधुवाद. गणपति बाप्पा आपकी सारी बाधाएं दूर करे.

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  17. शाश्वत सत्य को कहा है आपने ...यह सार समझ आ जाये तो बुढापे में कोई कष्ट ही न बचे

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  18. जब तक सांस है मुक्ति कहाँ.

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  19. ऐसा सम भाव होना इतना आसान नहीं ...
    मुक्ति तो मन की अवस्था है ...

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  20. ज्ञानवर्धक आलेख

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  21. जब तक सांस है मुक्ति कहाँ.

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  22. जीवन को दृष्टि देती बहुत अच्छी प्रस्तुति....

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  23. अच्छी प्रस्तुति के लिए बधाई |
    आशा

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  24. No one is free. We all are slaves of someone or something.

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  25. सुख दुःख राग विराग मान हानि में सम भाव सम्यक दृष्टि यही है जीवन का अंतिम लक्ष्य कोई पा जाए तो .....

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  26. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

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  27. बहुत ज्ञानवर्धक आलेख.

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