Monday, February 6, 2012

कार्य सिद्धि की नीति

                                   नास्ति  विद्यासमं  चक्षुर्नास्ति  सत्यसमं  तप:|
                                   नास्ति रागसमं दुखं नास्ति त्यागसमं  सुखम||
                                   उत्थातव्यं  जाग्रतव्यं  योक्तव्यं  भूति  कर्मसु |
                                   भविष्यतीत्येव   मन:  कृत्वा   सततमव्यथै:||


                  विद्या के समान कोई नेत्र नहीं है, सत्य के समान कोई तप नहीं है, राग के समान कोई दुःख नहीं है, और त्याग के समान कोई सुख नहीं है| "मेरा कार्य अवश्य ही सिद्ध होगा"  ऐसा दृढ  निश्चय कर के मनुष्य को आलस्य छोड़ कर उठना चाहिए तथा प्रसन्नता और आशा के साथ कल्याणकारी उन्नति के साथ कार्यों में जुट जाना चाहिए|

17 comments:

  1. श्रेष्ठ मानक..यही अपनाये जायें..

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  2. सुविचार है ... अब जाग मुसाफिर भोर भाई ...

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    घूम-घूमकर देखिए, अपना चर्चा मंच
    लिंक आपका है यहीं, कोई नहीं प्रपंच।।
    --
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज बुधवार के चर्चा मंच पर लगाई गई है!

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  4. बहुत सुन्दर एवं सार्थक प्रस्तुति !
    आभार !

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  5. बहुत सार्थक प्रस्तुति
    सादर.

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  6. इस सूक्ति के समान कोई उक्ति नहीं।

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  7. सही है मगर आजकल तो सच्चाई और ईमानदारी श्राप बनती जा रही है.पता नहीं कब ठीक होगा सब ?

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  8. सार्थक प्रस्तुति !...

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  9. क्या बात है । इस ज्ञानवर्धक जानकारी के लिए आपका आभार । मेरे पोस्ट पर आपका आमंत्रण है । धन्यवाद ।

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  10. सुंदर संदेश. आभार आपका.

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  11. प्रेरक सुभाषित।

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  12. बहुत सुन्दर रचना, ख़ूबसूरत भावाभिव्यक्ति , बधाई.

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  13. बहुत बेहतरीन....
    मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

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  14. कार्यसिद्धि की नीति - बेहतरीन पोस्ट हेतु आभार.

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