Tuesday, April 3, 2012

भोली गाय



                     बहुत समय पहले की बात है| किसी जंगल में एक गाय रहती थी| जो जंगल में घास चर कर अपना पेट भरती थी| इसी जंगल में एक शेर भी रहता था जो जंगली जानवरों का शिकार किया करता था| समय आने पर गाय ने एक बछड़े को जन्म दिया| बछड़े को जंगली जानवरों से बचाने के लिए गाय ने एक सुरक्षित जगह ढूढ़ली|                    
                   गाय सुबह अपने बछड़े को दूध पिला कर इस सुरक्षित जगह पर बैठा जाती, आप जंगल में घास चरने चली जाया करती थी| बछड़ा सारा दिन वहीँ बैठा रहता और खेलता रहता था| शाम को गाय आकर उसे दूध पिलाती और बहुत सारा प्यार देती थी| बड़े मजे से गाय और बछड़े के दिन बीत रहे थे| एक दिन जब गाय शाम को जंगल से घास चर के वापस आरही थी तो उसे एक पेड़ के नीचे शेर बैठा हुआ दिखाई दिया| गाय कुछ सोचती इस से पहले शेर ने गाय को देख लिया और अपने पास बुला लिया| गाय डरती हुई शेर के पास गई तो शेर ने कहा "मैं भूखा हूँ तुम्हें खाना चाहता हूँ"| 
                  गाय ने गिडगिडाते हुए कहा "मुझे कोई इतराज नहीं है आप मुझे खा सकते हैं लिकिन मेरी एक बिनती है कि मेरा बछड़ा सुबह से भूखा है पहले में उसे दूध पिला आऊं फिर आप मुझे मार कर खा लेना"| शेर ने कहा "तुम भाग जाओगी दुबारा यहाँ नहीं आओगी इस लिए अभी खता हूँ"| गाय ने कहा "मैं वादा करती हूँ कि बछड़े को दूध पिला कर मैं जरुर वापस आ जाउंगी"| शेर ने कहा " ठीक है जाओ और जल्दी ही वापस आ जाओ"| गाय अपने बछड़े के पास गई उसको दूध पिलाया और बहुत सारा प्यार किया|गाय की आँखें भर आई| गाय आंसू पोछते हुए शेर के पास लौट आई| शेर से कहा "अब आप मुझे खा सकते हैं"| 
                 गाय के इस भोले पन को देख कर शेर को दया आगई| शेर ने गाय से कहा मैंने तुम्हें जीवन दान दिया जाओ जाकर अपने बछड़े को दूध पिलाओ और बहुत सारा प्यार दो| गाय ख़ुशी ख़ुशी अपने बछड़े के पास आगई और दोनों आराम से रहने लगे|

20 comments:

  1. माँ की ममता के आगे सब होते लाचार

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  2. WILD ANIMAL ARE BETTER THAN US.THEY CAN THINK AND ACT HUNDRED TIMES BETTER THAN HUMAN BEING.
    NICE POST.

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  3. बहुत सुंदर मन को द्रवित करती कहानी ,बेहतरीन पोस्ट,....

    MY RECENT POST...काव्यान्जलि ...: मै तेरा घर बसाने आई हूँ....

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  4. इन्सान चाहे तो गाय और शेर दोनों से बहुत कुछ सीख सकता है,...............
    प्रेरक प्रस्तुति..........आभार.

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  5. बहुत सुन्दर कहानी है।आभार।

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  6. बहुत सुंदर कहानी है यह। ममत्व भरी।

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  7. सच बहुधा सफल हो जाता है।

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  8. ऐसी सुखांतक कथायें मन भाती हैं।

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  9. इसीलिए वो शेर है, दिल है वीर दिलेर ।

    स्वयं भूख से तड़पता, गाय छोड़ता घेर ।



    गाय छोड़ता घेर, बड़ी गैया है मैया ।

    दूध सहित दे प्यार, लौट कर आती गैया ।



    सज्जन का व्यवहार, सुधारे दुर्जन भारी ।

    आज होय पर हार, बड़े बाढ़े व्यभिचारी ।।

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  10. आपकी पोस्ट कल 5/4/2012 के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    http://charchamanch.blogspot.com
    चर्चा - 840:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

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  11. सुन्दर कथा, काश दुनिया ऐसी हो पाती।

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  12. सुंदर कथा के लिए आभार ! !
    शुभकामनायें आपको !

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  13. http://bulletinofblog.blogspot.in/2012/04/4.html

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  14. ओह शेर में भी समवेदनाएं थीं .... और हम इंसान ....?

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  15. गाय की ममता और ईमानदारी ने शेर को भी हिला दिया.
    सुंदर कहानी...

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  16. वाक़ई के शेर दिल कैसे होते हैं इसे भी यह कथा कह जाती है. बहुत खूब.

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  17. आपका ब्लॉग अच्छा लगा. कृपया ये बताने का कष्ट करें कि आपने एक ही कंपनी के बेनर पूरे ब्लॉग पर क्यों लगा रखें हैं. कृपया मेरे ब्लॉग कि ये पोस्ट पढें http://bhagatbpl.blogspot.in/2012/03/make-money-online-with-your-blog.html

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  18. आपकी सभी प्रस्तुतियां संग्रहणीय हैं। .बेहतरीन पोस्ट .
    मेरा मनोबल बढ़ाने के लिए के लिए
    अपना कीमती समय निकाल कर मेरी नई पोस्ट मेरा नसीब जरुर आये
    दिनेश पारीक
    http://dineshpareek19.blogspot.in/2012/04/blog-post.html

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  19. Welcome

    http://www.islamhouse.com/p/208559

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  20. meri dost ki taraf se ek msg :
    माफ़ी चाहूंगी आप के ब्लॉग मे आप की रचनाओ के लिए नहीं अपने लिए सहयोग के लिए आई हूँ | मैं जागरण जगंशन मे लिखती हूँ | वहाँ से किसी ने मेरी रचना चुरा के अपने ब्लॉग मे पोस्ट किया है और वहाँ आप का कमेन्ट भी पढ़ा |मैंने उन महाशय के ब्लॉग मे कमेन्ट तो किया है मगर वो जब चोरी कर सकते है तो कमेन्ट को भी डिलीट कर सकते है |मेरा मकसद सिर्फ उस चोर के चेहरे से नकाब उठाने का है | आप से सहयोग की उम्मीद है | लिंक दे रही हूँ अपना भी और उन चोर महाशय का भी
    http://div81.jagranjunction.com/author/div81/page/4/


    http://kuchtumkahokuchmekahu.blogspot.in/2011/03/blog-post_557.html

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