Friday, July 8, 2011

नीचा सिर क्यों?

             एक सज्जन बड़े ही दानी थे, उन का हाथ सदा ही ऊँचा रहता था; परन्तु वे किसी की ओर नज़र उठाकर देखते नहीं थे| एक दिन किसी ने उनसे कहा--"आप इतना देते हैं पर आखें नीची क्यों रखते हैं? चेहरा न देखने से आप किसी को पहचान नहीं पाते, इसलिए कुछ लोग आप से दुबारा भी ले जाते हैं"| इसपर उन्हों ने कहा-- भाई! में देने वाला कौन हूँ?
                   
                      देनहार कोई और है देत रहत दिन रैन| 
                      लोग भरम हम पर धरें याते नीचे नैन||
         
            देने वाला तो कोई दूसरा (भगवान) ही है| में तो निमित्त मात्र हूँ| लोग मुझे दाता कहते हैं|  इसलिए शर्म के मारे मैं आखें ऊँची नहीं कर सकता|

35 comments:

  1. दान के साथ विनम्रता,अहंकारहीनता ही 'सोने पर सुहागा' है.
    सुन्दर सार्थक विचार प्रस्तुत किये हैं आपने.
    आभार.

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  2. यह कायदे की बात है,लेकिन आजकल के दाता तो खुद को खुदा समझते हैं.

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  3. तू दानी दान भंडारा .....मैं तो निमित मात्र हूँ ....!

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  4. Aaj ke daani samjhe tb n. aabharAaj ke daani samjhe tb n. aabhar

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  5. प्रेरक कथा जो विनम्रता का सरल अध्याय पढ़ा जाती है.

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  6. bagvan ko koe nahe dekha hai, aap to madyam hai aap keyu aake nahe utha sakathi hai,

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  7. आप का बलाँग मूझे पढ कर आच्चछा लगा , मैं बी एक बलाँग खोली हू
    लिकं हैhttp://sarapyar.blogspot.com/

    मै नइ हु आप सब का सपोट chheya
    joint my follower

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  8. यदि आपकी पोस्ट हमारे देश के अनेको ट्रस्टों और सभी लोगों तक पहुंचे तो शायद देश के करोडो जरूरतमंद का कुछ भला हो जाये.

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  9. सुन्दर सार्थक विचार प्रस्तुत किये हैं आपने

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  10.  अस्वस्थता के कारण करीब 20 दिनों से ब्लॉगजगत से दूर था
    आप तक बहुत दिनों के बाद आ सका हूँ,

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  11. लोग इस जगत में यह समझ कर सिर उठाए घुमते हैं कि उन्होंने बड़े दान किए हैं और वे महादानी है... अनुकरणीय प्रकरण!!

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  12. काश लोग समझ पाते इसे !

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  13. अहाहा ... बहुत ही प्रेरक बात।

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  14. आपकी पोस्ट काफी कुछ कह जाती है. कुछ दुनिया से हटकर. पूर्णतः प्रेरक. आभार.

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  15. कवि रहीम के बारे में भी ऐसा ही कहा जाता है।
    यह दोहा भी रहीम का कहा हुआ माना जाता है।

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  16. कुछ शब्दों में दान की महिमा को बताया है.बहुत सुन्दर

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  17. बहुत ही प्रेरक बात
    आभार.

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  18. महेन्द्र वर्मा जी का कहना सही है, कवि रहीम जो खानखाना के पद पर कार्यरत थे, यह दोहा उनका कहा बताया जाता है। प्रश्न्य भी एक दोहे के रूप में ही है ’ज्यूं ज्यूं कर ऊंचा उठे, त्यूं त्यूं नीचे नैन’ कुछ ऐसा।

    बात एकदम सही है, हम खुद को पता नहीं क्या समझकर भ्रम में ही जीवन गुजार देते हैं जबकि होते हम निमित्त मात्र ही हैं। सुंदर पोस्ट लगी।

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  19. विनम्रता सहित श्रेष्ठ मानवीय गुणों को धारण करने का पाठ पढ़ाती...........प्रेरक लघु कथा

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  20. बड़ी पुरानी याद दिला दी ...शुभकामनायें आपको !

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  21. बहुत ही प्रेरक

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  22. प्रेरक लघु कथा, शुभकामनायें आपको !

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  23. इस सार्थक प्रस्तुति के लिए आपको बधाई.
    विन्रमता बहुत बड़ा गुण है. विन्रमता से आदमी महान बनता है.
    बिना किसी प्रयोजन के दिया गया दान आदमी को पूज्य बनाता है.
    दान में फल प्राप्ति की भावना नहीं होनी चाहिए.

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  24. भुत साएर्थक चिंतन है ... सूक्ष्म चिंतन ...

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  25. bahut badi baat kahi hai aapne
    vinamrata bahut bada gun hota hai .mujhe lagta hai ki ye uchh manv mulya hai
    rachana

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  26. इसीलिये गुप्त-दान को महादान माना जाता है.सुंदर दृष्टांत द्वारा प्रेरक संदेश देती रचना.

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  27. वाह,क्या बढ़िया और प्रेरक कहानी.

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  28. बहुत बढि़या। कहा भी है- नर की अरु नल नीर की, गति एकै कर जोइ। जेतौ नीचे होइ चलै, तेतो ऊँचे होइ।

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  29. बहुत ही प्रेरक प्रस्तुति...

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  30. सुन्दर सन्देश देती हुई लाजवाब और प्रेरक कथा! शानदार प्रस्तुती!

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  31. आपको गुरु पूर्णिमा के शुभ अवसर पर सुगना फाऊंडेशन मेघलासिया जोधपुर और हैम्स ओसिया इन्स्टिट्यूट जोधपुर की ओर से हार्दिक शुभकामनाएं.

    आपको गुरु पूर्णिमा की ढेर सारी शुभकामनायें..

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  32. achha laga prernaprad kahani padhna

    shubhkamnayen

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