Thursday, February 17, 2011

सहारा

अंगुली पकड़ कर चलनेवाला मैं,
उस दिन बिना सहारे के चला था|
पहली बार गिरा फिर रोया,
रोता रहा बेजार|
मुझे सहारा चाहिए था खड़ा होने के लिए,      
उन सहारों को पकड़ कर आहिस्ता आहिस्ता चलने के लिए|
मगर कोई नहीं आया,
मैं चीखा था चिल्लाया था|
मैंने हाथ भी फैलाए थे,
मगर कोई नहीं आया|
तब मैंने ढूंढा था,
शायद खुद में ही खुद के लिए सहारा|
तब मैं नादान था इन बातों से अंजान था,
पर अब कभी जब भी मैं गिरता हूँ,
रोता नहीं, पर सोचता जरुर हूँ,
यदि उस दिन किसी ने सहारा दिया होता,
तो मैं जिन्दगी भर सहारों के बल पर ही चल रहा होता|

47 comments:

  1. कोमल अहसासों से परिपूर्ण एक बहुत ही भावभीनी रचना जो मन को गहराई तक छू गयी ! बहुत सुन्दर एवं भावपूर्ण प्रस्तुति ! बधाई एवं शुभकामनायें !

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  2. यदि उस दिन किसी ने सहारा दिया होता,
    तो मैं जिन्दगी भर सहारों के बल पर ही चल रहा होता|

    और फिर हममें एक लत पड़ जाती है , तो हम जिन्दगी में किसी के सहारे के बिना आगे नहीं बढ़ पाते ...बहुत प्रेरणादायी...

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  3. प्रेरणादायी पंक्तियाँ..... खुद को संभलना आ जाये इससे बेहतर क्या हो सकता है.....

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  4. कब सहारा हटाना है, सहारा देने वाला ही निर्धारित करता है।

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  5. खुदका सहारा खुदको ही बनना पड़ता है ... बहुत सुन्दर !

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  6. प्रेरणादायी पंक्तियाँ

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  7. प्रेरणादायी पंक्तियाँ..... इसे ही तो कहते हैं अपने पैरों पर खड़ा होना और जिंदगी में इससे सुखद एहसास कोई नहीं.. बहुत सुन्दर

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  8. आत्मविश्वास अपनी ही दहलीज पर खड़ा होता है. सुंदर रचना.

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  9. बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति।

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  10. अनावश्यक सहारा एक इंसान कों parasite बना देता है । बहुत ही प्रेरनादायी रचना ।

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  11. बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति।
    बधाई एवं शुभकामनायें !

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  12. प्रेरणास्पद एवं अनुकरणीय रचना बहुत ज्ञानवर्धक है.

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  13. अपने पैरों पर खड़ी प्रेरक कविता.

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  14. यदि उस दिन किसी ने सहारा दिया होता,
    तो मैं जिन्दगी भर सहारों के बल पर ही चल रहा होता|
    sach aur anubhav se bhari baate ,marta kya nahi karta jeene ke liye ,bahut bahut achchhi rachna .

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  15. प्रेरणास्पद एक सुन्दर रचना.... आभार. सच ही आपकी यह रचना स्वामी विवेकानंद जी के इन शब्दों के कितने करीब है.- "..... Be free; hope for nothing from any one. I am sure if you look back upon your lives, you will find that you were always vainly trying to get help from others, which never came. All the help that has come was from within yourselves . ........."

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  16. मनोबल को ऊँचा उठाती पंक्तियाँ आभार

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  17. एक बार सहारे की आदत हो जाये तो फ़िर हमेशा सहारा तलाशने पर ध्यान रहता है।
    सुंदर विचार हैं।

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  18. दिल की गहराइयों से निकली सुंदर अभिव्यक्ति. धन्यवाद.

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  19. तब मैंने ढूंढा था,
    शायद खुद में ही खुद के लिए सहारा

    अपना सहारा खुद हो जाना ही श्रेयस्कर है।
    बहुत अच्छी कविता।

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  20. What an inspiring poem,really praise worthy.Keep writng my dear friend.
    Thsnks a lot for yr kind comment on my blog.
    Thanks again.
    dr.bhoopendra

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  21. मैं चीखा था चिल्लाया था|
    मैंने हाथ भी फैलाए थे,
    मगर कोई नहीं आया|
    तब मैंने ढूंढा था,
    शायद खुद में ही खुद के लिए सहारा.........khubsurat abhivyakti

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  22. रचना में प्रेरणा से पूर्ण भाव
    रोमांचित करते हैं ...
    अभिवादन .

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  23. Khud ka sahaara mil jaaye to kya baat hai ... jeene ki kala aa jaati hai ...

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  24. बहुत प्रेरक रचना.
    आभार

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  25. सोना तो तप के ही कुन्दन बनता है।

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  26. एक दूसरा पहलू यह है कि हम किसी भी क्षण बेसहारा नहीं हैं।

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  27. भावभीनी रचना जो मन को छू गयी ! बहुत सुन्दर एवं भावपूर्ण प्रस्तुति ! बधाई

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  28. मैं चीखा था चिल्लाया था|
    मैंने हाथ भी फैलाए थे,
    मगर कोई नहीं आया|
    तब मैंने ढूंढा था,
    शायद खुद में ही खुद के लिए सहारा..
    सशक्त सहारा तो वही होता है जो खुद को खुद ही दिया जाये। प्रेरक पाँक्तियाँ। शुभकामनायें।

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  29. अपने आप में एक आत्मविश्वास जगाती खुबसूरत रचना |

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  30. प्रेरणास्पद रचना बहुत ज्ञानवर्धक है.

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  31. पर अब कभी जब भी मैं गिरता हूँ,
    रोता नहीं, पर सोचता जरुर हूँ,
    यदि उस दिन किसी ने सहारा दिया होता,
    तो मैं जिन्दगी भर सहारों के बल पर ही चल रहा होता|
    bahur khoob bhai

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  32. 'यदि उस दिन किसी ने सहारा दिया होता,
    तो मैं जिन्दगी भर सहारों के बल पर ही चल रहा होता|'
    - सुन्दर |

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  33. आत्‍मनिर्भरता का यही मूल मंत्र है। अच्‍छी रचना।

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  34. बहुत सुन्दर विचार युक्त कविता है |

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  35. उम्दा लफ़्ज़ों की दास्तान, बा-खूब लफ़्ज़ों का सहारा, प्रसंशनिये!! आभार!!

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  36. namaskaar,
    naye blog lekhakon ka bhi haunsala badhayen,ek nazae mere blog par bhi dalen.
    krati-fourthpillar.blogspot.com

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  37. गिर कर मैंने संभलना सीखा, फ़िसलकर मैंने चलना सीखा !
    यों हि मैने जमाने से ही ज़माने से लड़ना सीखा !

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  38. अच्छा सन्देश दे रही उम्दा पोस्ट !

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  39. वाकई.....
    हार्दिक शुभकामनायें आपको !

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  40. बहुत ही सुन्दर विचार युक्त रचना है|

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  41. amazing poem , pahli baar aapke blog par aaya hoon aur sach me bahut khushi hui mujhe aapko padhkar ..
    meri badhayi sweekar kare.

    -----------
    मेरी नयी कविता " तेरा नाम " पर आप का स्वागत है .
    आपसे निवेदन है की इस अवश्य पढ़िए और अपने कमेन्ट से इसे अनुग्रहित करे.
    """" इस कविता का लिंक है ::::
    http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/02/blog-post.html
    विजय

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  42. यदि उस दिन किसी ने सहारा दिया होता,
    तो मैं जिन्दगी भर सहारों के बल पर ही चल रहा होता|
    सुन्दर और प्रेरणा देती हुयी रचना अपने पैर पर खड़ा होना स्वावलंबन बहुत ही जरुरी होता है -
    बधाई हो
    शुक्लभ्रमर५

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