Sunday, November 21, 2010

" निरोगी" दोहे

१. शीतल  जल में डालकर सौफ  गलाओ  आप |          
   मिश्री  के संग  पान  कर  मिटे  दाह- संताप ||

२.फटे विमाइ  या मुंह फटे , त्वचा खुरदुरी होय |
   नीबू-मिश्रित  आंवला  सेवन  से  सुख होय ||

३. सौंफ  इलाइची गर्मीमें, लौंग सर्दी में खाय |
    त्रिफला सदाबहार है, रोग सदैव  हार जाय ||

४.वात-पित्त जब जब बढे, पहुंचे अति कष्ट |
   सौंठ, आंवला, दाख संग खावे पीड़ा नष्ट ||                                   
                                 
 ५.छल प्रपंचसे दूर हो, जन मंगल की चाह |
    आत्मनिरोगी जन वही गहे सत्यकी राह ||
साभार  कल्याण

10 comments:

  1. बहुत ही बढिया लगे ये निरोगी दोहे । आखरी वाला तो मुकुटमणि ।

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  2. छल प्रपंचसे दूर हो, जन मंगल की चाह |
    आत्मनिरोगी जन वही गहे सत्यकी राह ||
    sunder dohey,be healthy.....

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  3. आपने आयुर्वेदिक नुस्खे सरल भाषा में प्रस्तुत करते हुए जीवन की अमूल्य बात भी कह दी.
    धन्यवाद

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  4. निरोगी दोहे का छल प्रपंच - - - - - गहे सत्य की राह सबसे अच्छा लगा जो जीवन की वास्तविक उपलब्धी है | आप हमारे ब्लॉग पर आये आप का बहुत बहुत धन्यवाद

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  5. तन ही नहीं,मन को भी नीरोगी रखने के उपाय। बहुत सुंदर।

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  6. औषधीय दोहे अच्छे लगे ।

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  7. उपयोगी दोहे ।
    तीसरे दोहे के अंतिम पंक्ति में 11 की
    जगह 13 मात्रायें हैं देख लीजियेगा।

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  8. वाह! अनोखा है ये निरोगी दोहे.

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  9. बेहतरीन प्रस्तुति, अनंत बधाई। भाव महत्वपूर्ण है, अनुकरणीय भी।

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