Sunday, October 30, 2011

पापके स्वीकारसे पाप-नाश

                                  मोहादधर्मं य:  कृत्वा   पुन:  समनुतप्यते|
                            मन:समाधीसंयुक्तो न  स सेवेत  दुष्कृतम||
                            यथा यथा  मनस्तस्य  दुष्कृतं कर्म गर्हते|
                            तथा  तथा  शरीरं  तु  तेनाधर्मेण  मुच्यते||
                            यदि विप्रा:कथयते विप्राणां धर्मवादिनाम|
                            ततोsधर्मकृतात क्षिप्रमपराधात प्रमुच्यते||
                            यथा  यथा   नर:   साम्यगधर्ममनुभाशते|
                             समाहितेन मनसा  विमुच्यती तथा तथा||  



                    जो मोहवश अधर्म का आचरण  कर लेने पर उसके लिए पुन: सच्चे ह्रदय से पश्र्चाताप करता और मन को एकाग्र रखता है, वह पाप का सेवन नहीं करता| ज्यों ज्यों मनुष्य का मन पाप-कर्म की निंदा करता है, त्यों त्यों उसका शारीर उस अधर्म से दूर होता  जाता है| यदि धर्मवादी ब्राह्मणों के सामने अपना पाप कह दिया जाय तो वह इस पापजनित अपराध  से शीघ्र मुक्त हो जाता है| मनुष्य जैसे जैसे अपने अधर्म की बात बारम्बार प्रकट करता है, वैसे वैसे वह एकाग्रचित हो कर अधर्म को छोड़ता जाता है|


22 comments:

  1. सच्चा पश्चाताप निश्चित ही परिमार्जित करता है!

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  2. बहत सुन्दर और सार्थक चिंतन.
    पश्चाताप से मन का शोधन होता है.

    सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार.

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  3. पश्चाताप यदि सच्चे मन से हो तो बात सीधे ईश्वर तक पहुँचती है.सुंदर विचार.

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  4. पश्चाताप पाप धो देता है।

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  5. अनुपमा जी ने सटीक टिप्पणी की है- 'सच्चा पश्चाताप निश्चित ही परिमार्जित करता है!'
    बहुत खूब.

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  6. बहुत सुन्दर ! पश्चाताप अगर सच्चे मन से किया जाए तो ज़रूर फल मिलता है !
    मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

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  7. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    सूचनार्थ!

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  8. बहुत उपयुक्त श्लोक का चयन किया है आपने.

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  9. प्रायश्चित मन से किया जाए तो निश्चित ही !

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  10. अच्छी प्रस्तुति .. पाप मार्ग को छोड़ने का उपाय सच्चे मन से प्रायश्चित करना ही है .

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  11. बहुत हि सार्थक लेख !

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  12. सुदर सीख देता हुआ श्लोक । पर किसी के सामने पापा स्वीकारना सबसे कठिन कार्य है । अपने आप से तो मन स्वीकर ही लेता है ।

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  13. इस अनुष्टुप छन्द का हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत कर आप ने महतकर्म किया है
    साधुवाद

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  14. अनुष्टुप छन्द का हिन्दी अनुवाद
    सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार.....!

    संजय भास्कर
    आदत....मुस्कुराने की
    पर आपका स्वागत है
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  15. सच्चे ह्रदय से पश्चाताप करना और मन को एकाग्र करना पाप के मार्ग को आयन्दा के लिये बन्द करना ही है। धर्मात्माओं के सामने आत्मस्वीकृति भी वचन की गोपनीयता को तोड़कर सन्मार्ग पालन में सहायक सिद्ध होती है। आभार!

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  16. मेरे नये पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://seawave-babli.blogspot.com/

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  17. मेरे ब्लॉग पर आप आये,इसके लिए बहुत बहुत आभार आपका.

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